शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

साठवें वर्षगाँठ पर अनाम सुन्दरी को देखकर

हज़ारों कौंध कर टूटी बिजलीयाँ
लगा सागर में है सैलाब आने
किसी के रूप का उद्दीप्त चेहरा
चला कैसा अरे जादू जगाने

वगैर मरकत के फिर भी रोशनी है
उजाला गोसे गोसे में समाया
स्वर्ग की किन्नरी उतरी धरा पर
ह्रदय में फिर नया तूफान आया

मैं संयम का लबादा ओढ़ कुंठीत
जलूं इस आग में ऐसा न होगा
अमिय का पान पहले छक के कर लूं
तभी मानव जन्म यह पूर्ण होगा

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