शुक्रवार, मार्च 21, 2014

प्यार में

तुम्हें जितना भी प्यार करूँ
थोडा है

जब तक दुनियाँ
हमारे प्यार को देख कर
रश्क ना करने लग जाये
तब तक मुझे तसल्ली नहीं होगी ।

मुझे तसल्ली नहीं होगी जब तक लोग
हमारे प्यार की कसमें ना खाने लगें

प्रिये
मुझे डुबे रहने दो अपने प्यार में 

चौरंगी पर एक शाम

चौरंगी के इस भीड़ भरे रास्ते में
मैं अकेला हूँ
उदास हूँ
सुबह का सूर्य जब थक कर
पश्चिम में विश्राम करने जाने लगता है
तब
हरी ,नीली ,पीली और लाल बत्तियों के साथ
चौरंगी पर एक रंगीन शाम उतर आती है
आफिसों की छुट्टियाँ होती हैं
मैटनी शो खत्म होता है
मैट्रों ,न्यू एम्पायर और लाइट -हाउस से
एक भीड़ निकल आती है
सेन्ट और लेवेंडर की महक
चौरंगी के भीड़ भरे रास्ते में तैर जाती है
और तब
फुटपाथों पर खड़े हुए
फाउन्टेन पेन ,घड़ियाँ ,खिलौने बेचने वाले
           छोकरों की आवाजें तेज हो जाती हैं
काफी -हॉऊसों ,टी स्टालों तथा
पान की दूकानों पर
भीड़ जमा हो जाती है

और कहीं भीड़ से परे
अपने शरीर को बेचने वाली लड़की
होठों पे मुस्काराती है
आँखों के इशारे से पास बुलाती हैं
तब
चौरंगी के इस भीड़ भरे भरे रास्ते में
नगमा
मुझे तुम्हारी याद आती है

शादी के ब्यालिसवें वर्षगांठ पर

स्वपन देख रहा हूँ मैं
सोई हुई औरत का
स्वपन देख रहा हूँ मैं
अपनी पत्नी को स्वपन में देख रहा हूँ मैं

चाहता हूँ मैं
पत्नी को आलिंगन में लेना
पर ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ मैं
असक्त हूँ मैं
नहीं विवश हूँ मैं
सोचता हूँ
कौन छिड़कियाँ खायें
बुढ़ा चैन से सोने भी नहीं देता 

गुरुवार, मार्च 20, 2014

रूपान्तर

चाँदी की नाव सी
एक देह लहराई

बाँध सका ना मनको
दौड़  पड़ा सन्यासी
बाते उड़ी फैल गई
मथुरा से ले काशी
सन्यासी बढ़ आगे
नाव पे सवार हुआ
जैसे कुछ भूला था
अब जा के याद हुआ

प्रकृति शरमाई 

भाग्य

तुम्हारी तरह
अधुरी जिन्दगी जी रहा हूँ मैं
फर्क तो बस इतनी है
कि तुम तो आजाद हो
और मैं कैद
भाग्य की लिखावट में भले तुम विश्वास करो
मेरा मानना है
हम अपने भाग्य के निर्माता स्वय बन सकते हैं
प्रिय तुम साहस करो
मैं तुम्हारे साथ हूँ । 

दिल की बाते

तुम्हारी आँखों में
मैं देखता हूँ लज्जा

मुझे पता है तुम
कायर नही हो

मैं सच कह रहा हूँ ना 

पहेली

किसी नये अनुसंधान के तहत्
मैं हर बार एक नई देहयष्टि की कामना करता हूँ

तुम्हारे सम्पुस्ट उरोजों के पार
मै जानता हूँ
तृष्णा की है एक झील

मुझे मालुम है
तुम्हारे कटिप्रदेश का गह्नर
मन की अतल गहराईयों से
कहीं ज्यादा है असीम

प्रकृति की तरह बदलता
पल -पल तुम्हारा रूप
मैं चाहता हूँ समा लू अपनी बाहों में

ओ मृगनयनी
तुम्हें संपूर्ण रूप से जानने के लिए
कितना है लघु जीवन

देह का जादू

चाहे पूरब हो या पश्चिम
चाहे उत्तर हो या दक्खिन
देह का जादू
सबके सर पर चढ़कर बोल रहा है

चाहे किशोर हो या जवान
चाहे अधेड़ हो या वृद्ध 
देह के जादू से सभी चमत्कत हैं

खण्ड़र में तब्दल होती औरतें
बुढ़ी नानी -दादी और मायें
देह के जादू को देख
नाक भौंहे सिकोड रहीं हैं ।  

बुधवार, मार्च 19, 2014

स्वराज

यह सच है कि अब है अपना राज
तुम व्यर्थ करते हो पालिर्यामेंट में बहस
उठाते हो तीन आने और तेरह आने की बात
क्या अब भी नहीं मरते लोग भूख से
क्या यह कम है बड़ी बात
जय जय अपना स्वराज

                  (नेहरू और लोहिया के संसद में बहस को लेकर )

समय चक्र (11)

खबरों के बीच
छपी एक  छोटी खबर
पत्नी से पीड़ित पति ने खुदकशी कर ली ।

खबरों के बीच
छपी एक  बड़ी  खबर
तीन बच्चों की माँ
बच्चों को छोड़
एक नाबालिक लड़के को ले भाग गई ।

समय कितनी तेजी से बदल रहा है
आप भी मानेंगे न श्रीमान ।

पत्नी के रूठने पर

किसे कहूँ अपना
जब अपने ही पराये हो गयें
हर हसीन सपना अब डरावना लगता है
अपने अपने अहम की गिरफ्त में जी रहें हम
चाहते हैं
लोग हमें अच्छा कहें ।

भेद

दूसरों से लड़ने के लिये
तुम हमेशा रहते हो तैयार
क्या कभी तुमनें
अपने अन्दर की कमियों से
लड़ने की कोशिश कि है
कोशिश करके देखो
तुम सचमुच हार जाओगे
अगर तुम जीत गये
सच
तुम भी एक अवतार बन जाओगे ।

सदी का सच - 2

मुझे अच्छे लगते हैं
फूल ,नदी ,झरने ,औरत और पहाड़

मुझे घृणित  लगते हैं
झूठ ,चोरी ,बेईमानी और चापलुसी

तुम मेरे विषय में कुछ भी धारणा बनाओ

मुझे पता है
मै  अपनी सदी का एक अकेला कवि हूँ । 

मेरा कवि

जब कभी तुम
मुझे करती हो भरपुर प्यार
मेरा मन आल्हादित हो उठता है
और मैं कविता लिखने बैठता हूँ

मैं कविता लिखने बैठता हूँ

जब किसी का कोई दर्द
मेरे दिल में समा जाते हैं
और किसी के आंसू
द्रवित कर मेरे हो जाते हैं
मैं कविता लिखने बैठता हूँ

मैं धूर्जटी सा भले रहूँ खामोश
पर मेरे रौद्र रूप पर
कितनों के सिंहासन हिल जाते हैं

मैं कलम गिरवी रखकर
कविता नहीं लिखता 

नाम तुम्हारा

तप रहा था मैं
अंक में भर कर तुम्हें मैं
शीतल हुआ

 जानता हूँ मैं
तुम सिर्फ मेरी नही हो
बल्कि सारे जहान की हो

फिर भी नही हो तुम कुलटा

तुम हो धरती का श्रृंगार

और बहुत प्यारा सा है तुम्हारा नाम

सरिता




जीवन और मृत्यु के बीच

(तिरसातवे वर्षगांठ पर )

यार दोस्तों के कहने पर भी
नौटंकी देखने नहीं जाता मैं

नौटंकी रोज -रोज मेरे घर में ही होती है
कैसे बतलाऊँ मैं अपने मित्रों को

मुझे पता है
मेरे बच्चो का बचपन
कितनी त्रासदी में गुजरा है

सुनता रहा हूँ मैं
गम गलत कर देती है शराब
लेकिन अफसोस मैं शराबी नहीं बन पाया

इन्द्रिय लोलुपता का खिताब
मेरी पत्नी से अनायास ही मुझे मिल गया है
जिसे मैंने चुपचाप शिरोधार्य कर लिया है

इधर छन -छन कर आ रही है आवाज मेरे कानों में
कि मैंने रखैल रख छोड़े हैं

टूटती सांसों की बेला में
मैं एक अदद रखैल खोज रहा हूँ


मंगलवार, मार्च 18, 2014

सुख

प्यार ,विश्वास और धोखा
ये तीन निरर्थक शब्द हैं 

मैंने इन शब्दों को कभी महत्व नहीं दिया 

मैं सुखी व्यक्ति हूँ । 

दंश

तुम भी झूठ बोलने लगे दर्पण
क्या हुआ जो मेरे कुछ केश
हो गये हैं अगर सफेद
चेहरे पर दिखने लगी हैं
एक -दो झुरियाँ
दिल मेरा अब भी है जवान
कहाँ खत्म हुआ है मेरा सौंदर्यबोध
मुझे डरावने सपने मत दिखाओ
रूप के पुजारी को
कायर मत बनाओ 

क्या करोगे मेरी कविता का

तलवार से मुझे काटोगे
काटो
बन्दुक से मुझे मरोगे
मारो
तोप से मुझे उड़ाओगे
उड़ाओ

लेकिन क्या करोगे मेरी कविता का

जो प्रेमी जगायेगी
नफरत मिटायेगी
शोषण के खिलाफ
लड़ना सिखायेगी  

प्यार

प्यार
एक सजीव ईकाई है
या निर्जीव
इस पर बहस चलाई जा सकती है
लेकिन प्यार के लिये
स्पर्श ,चुम्बन और आलिंगन
आवश्यक तत्व हैं
इस पर बहस की गुंजाईश नहीं । 

पत्नी से झगड़ कर

तुमने मेरी जिन्दगी में जहर घोला

धन्यवाद

आभारी है  तुम्हारा
यह सकल विश्व
साहित्य -समाज

तुमने मुझे कवि बना दिया




जीने के लिये

जीने के लिये जरूरी है
रोटी ,कपड़ा और मकान

उल्लासपूर्ण जीने के लिये जरूरी है

मैथुनी क्रियायें
लहरिया संगीत
और कविता 

फैसला

वे
जो कृत्रिम अभावों  को जन्म देते हैं
लाखों करोड़ों को भूखा मरता छोड़
अपना घर भर लेते हैं
उनसे मुकाबिला करना है तो
भूख पीड़ित दोस्तों
सिर्फ नारे ना लगाओं
अगर तुम्हें रोटी चाहिये तो
संगीनों का डर छोड़
अपने सीनों को मजबूत बनाओं 

सन्देश

मैं तुमहे कुछ भी नहीं कहूँगा
आँखें की भाषा
पढ़ना जानती हो ना तुम
देखो
मैं अपलक तुम्हें
निहार रहा हूँ 

गांधी

एक हठ योगी का नाम का था
गांधी
एक लंगोटीधारी का नाम था
गांधी
गांधी कोई बहुरुपिया तो नहीं था
फिर क्या था गांधी ?
एक अवतार
जैसे राम
एक अवतार
जैसे ईसा
एक अवतार
जैसे मुसा
काल करता है अटहास और कहता है
मानवता के पुजारी का
कोई एक नाम नहीं होता । 

धुन

यही है वह सबसे ऊँचा पहाड़
जिस पर मैं चढ़ नही पाया हूँ
यही है वह सबसे उच्छिखल नदी
जिसमें मैं तैर नहीं पाया हूँ
यही है वह सबसे घना अरण्य
जिसे मैं पार नहीं कर पाया हूँ
यही है वह सबसे सुन्दर औऱत
जिसके साथ मैं सो नहीं पाया हूँ
दोस्त
मेरी असफलता पर मत हँसो
मैं प्रयासरत हूँ
तुम्हे तो पता है
असफलता ही सफलता की कुंजी है । 

सोमवार, मार्च 17, 2014

नई हवा

भीड़ को देखता हूँ मैं
हर एक की आँखों में है भूख
नजरे पारदर्शी नायलोनी वस्त्रों को भेदकर
टटोलती हैं जिस्म
पैडो में बंधा हुआ है शरीर
उरानियत
शहरों से फैलकर
करबों तक पहूँच गई है
देह के भूगोल को देख व पढ़
अधेड़ और बुढ़े लोग
छुपकर पावरफुल गोलियाँ खाने लगे हैं ।

खुश रहने के लिये

मैंने एक स्वप्न पाल रखा है
मादा जुगनू की तरह
हर बाला
मुझे अपनी ओर आकर्षित-
            करने की होड लिये बैठी है
मैं कितना खुशनसीब हूँ
मै हर रात किसी की बाँहों में सोता हूँ 

हम

हथेली पर सरसो उगा रहे हैं हम
जुगनू की रोशनी पा
सूरज को चिढ़ा रहे हैं हम
अपनी लघुता का एहसास नहीं हमें
घमंड में फूले जा रहे हैं हम 

सदी का सच

मेरे मरने की झूठी खबर छपी है अखबारों में

मैं मृत्युंजय हूँ

यकीन नही आता उन्हें
जो ना समझ हैं

मैं जीवित रहूँगा सदा-सदा
अपनी कविताओं में

सम्बन्ध

मेरे रकीबों को पता है
कविता मेरी महबुबा है
कितनी गलत फहमी में है मेरे रकीब
उन्हें पता नही
कविता मेरी बीवी है
जिन्हे पता है कविता मेरी बीवी है
वे भी कहा जान पायें हैं
मेरे और कविता के बीच के संबंध को
मेरे खुशकहम रकीबों
तुम बाज नही आओगे
दुसरों की जिन्दगी में झाकनें से
तो सुनो मैं बताता हूँ तुम्हें
कविता मेरी जिन्दगी है । 

प्यार

मिलना था तुम्हें
अठारहवे बसन्त में
मिले तुम मुझे
तिरसठवे वर्ष में
शुक्रिया मेरे प्यार
मै आभारी हूँ तुम्हारा
तुमने मुझपर विश्वास किया । 

प्रेम

सुनो यह कविता तुम्हारे लिये है
सिर्फ तुम्हारे लिये
इस कविता को मैं कभी भी
छपे अक्षरों मैं नहीं उतारूँगा
इस कविता को मैं कभी भी
किसी दूसरे के सामने नहीं गुनगुनाऊँगा
प्रेम मे कुछ तो रहनी चाहिए राजदारी
यह कविता हमारे और तुम्हारे प्रेम की
राजदार बनी रहेगी । 

शहर

और वहाँ
जहाँ हमारी प्राचीन सभ्यता का अन्त हो रहा हैं
जहाँ हम भागते हैं
समय के पीछे
तजकर मनुष्यता
एक ही मकान में रहते हुए भी
जहाँ
हम मरे हुए व्यक्ति के कमरे के उपर बैठकर
मनाते हैं  खुशियाँ
शहर
ना जाने क्यों
तुम्हारे यहाँ के लोग
इतने निर्मम होते हैं । 

औरत की मुट्ठी में

ढेर सारी औरतें मुगालतें में है
कि वे सभी पुरुषों को
अपनी मुट्ठी में कैद कर सकती हैं
सभी पुरुष इसे माने ना माने
मैं हर औरत की मुट्ठी में कैद होना चाहता हूँ ।

स्वीकृति

जब आईना देख
तुम स्वयं शर्मा जाओ
सच कहना
क्या कुंवारापन तुम्हे
बोझ नहीं लगता

          जब आईना देख
          तुम सोच में पड़ जाओ
          तुम्हे इजाजत है प्रिये
          तुम मुझे पुकार लेना ।

बहुत दिन पहले एक औरत

वह जो नंगे 
बिस्तर पर सो रहा है 
कौन है ?
कि जिसके हाथों में हैं 
पयस भरा स्तन 
कौन है ?

सिलवटे उभरी हुई हैं 
बिस्तर पर 
लगती हैं चादर 
गीली - गीली सी 

 क्यों नहीं मन 
अपराध की भावना से 
ग्रस्त हों जाता 
क्यों नहीं कुछ 
गलत सोचता है मन 

याद आया 
सोया था मैं भी कभी 
किसी औरत के साथ 
ठीक ऐसी ही 
बहुत दिन पहले 

कौन थी वह औरत ?

सिर्फ तुम

मैंने चुरा ली है
किसी की आँखों की नींद

किसी ने
मेरी आँखो की नींद चुरा ली है

मैं  किसका अपराधी हूँ
मुझे पता नहीं

लेकिन मुझे पता है
मेरे अपराधी तुम हो
सिर्फ तुम 

धैर्य

तुम्हारी तारीफ करूँ
तुम चाटुकार समझोगी
मैं चुप रहूँ
तो ना समझ

मैं ना वाचाल हूँ
ना ही विज्ञ

प्रेमी धैर्यवान होते हैं

मैं धैर्यवान हूँ
हूँ ना ?

कवि से

पत्थर पूज या माटी पूज 
जिसको दिल चाहे तू पूज 

          जो ढोंगी पाखण्डी हैं 
          चाहे तो उसको ही पूज 

चारण बनके ही जीना जब 
लूले-लंगड़े को भी  पूज 

          सुविधा का पथ बहुत सरल हैं 
           सुख को चुन या दुख को पूज

जो तु चाहे आत्मतोष तो 
पहले दीन -दुखी को पूज

           तेरा आसन सबसे ऊँचा 
           तू आजाद कलम को पूज

शायद कभी नहीं

हम तुम दोनों चुप हैं
हवाँए  भी चुप हैं
शब्द जिह्वा पर आने को
मचल रहे हैं
लेकिन पारदर्शी शर्म के पर्दे को
पहले कौन बेधे
यही सोच
हम तुम दोनों चुप हैं
हवाँए भी चुप हैं
कभी
उत्तेजना का कोई थरथरा एक छण
जब हमारी शिराओ में दौड़ जाता है
तब हम
निनिर्मेष
एक दूसरे को देख रहे होते हैं
सजगता लिए हुवे
पीड़ित होकर
जानना चाहते हुए भी
शायद हम कभी नहीं जान पायेंगे
जीवन का मुल्य बोध