चाँदी की नाव सी
एक देह लहराई
बाँध सका ना मनको
दौड़ पड़ा सन्यासी
बाते उड़ी फैल गई
मथुरा से ले काशी
सन्यासी बढ़ आगे
नाव पे सवार हुआ
जैसे कुछ भूला था
अब जा के याद हुआ
प्रकृति शरमाई
एक देह लहराई
बाँध सका ना मनको
दौड़ पड़ा सन्यासी
बाते उड़ी फैल गई
मथुरा से ले काशी
सन्यासी बढ़ आगे
नाव पे सवार हुआ
जैसे कुछ भूला था
अब जा के याद हुआ
प्रकृति शरमाई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें