शनिवार, दिसंबर 31, 2011

दोहा 6

हो गई जिसपे मेहरबान नज़र
सनसनीखेज हो गई है खबर


पाँव रखना ज़रा हौले हौले
लग ना जाए कही दुनियाँ की नज़र


टूट कर गिर रही कैसी बिजली
सब ने सोचा के  अब तो होगा कहर


मेरा बिराना दिल तो सब्ज हुआ
मेरी रातों को मिल गया है सहर


अपनी आंखों में बस के रहने दो
मेरे नसीब का है तेरा सहर

दोहा 5

फूलों से आशियाँ सजा लेना
मैं जो रूठू तो तुम मना लेना

जैसे तड़पा रहा हूँ तुमको मैं
तुम भी तड़पा के कुछ मज़ा लेना

होश खोने लगूँ अगर मैं तो
अपने आँचल में तुम छुपा लेना

दूर तुमसे रहूँ भले जितना
एक आवाज़ पर बुला लेना

शक की सरहद पर पाँव मत रखना
अपना मत  आशियाँ जला लेना

दोहा 4

दिल जिसे चाहता उसे ही चुनों
प्यार करना है  तो मजबूत बनों

जलने वाले तो जला करते है
रोशनी दे सको - कंदील बनों

प्यार का नाम तुमसे रौशन हो
दोस्त ऐसा ही अलमगीर बनों

बनके दिखला दो मसीहा तुम भी
लोग पूजें तुम ऐसा पीर बनों

राहें उल्फत तो है काँटों का सफ़र
सच्चे प्रेमी की तरह धीर बनों

दोहा 3

कभी तो खुशियाँ लुटा के देखो
गले किसी को लगा के देखो

मैं दर्दे दिल की दवा रहा हूँ
कभी तो मुझको बुला के देखो

चमक पे कंचन के तुम ना जाओ
खरा है कुन्दन तपा के देखो

वगैर खता के क्यों रूठे हो तुम
क्या चाहिए वो बता के देखो

तुम्हारे रंग में मैं रंग गया हूँ
ना और मुझको सता के  देखो

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

दोहा 2

दिल जो तुमको चाहता है हम है बेबस  क्या करे
हम तो अपना दिल तेरी तस्वीर से बहला रहें

मत परेशां हो बहारो के लिए तुम  जानेमन
हम  बहारो की लिए सौगात चल के आ रहे

खोल कर दिल रख दिया हमने तुम्हे अब क्या कहे
आप अपनी बारी में नाहक प्रिये शर्मा रहे

सांसें सिमटी जा रहीं है सोच कर देखो ज़रा
मत सजा अपने को दो कब से तुम्हे समझा रहे

दोहा 1

लाज भरी रस की प्याली है
आप की ये चंचल आँखें

दिल की  बात करूँ क्या तुमसे
आप बहुत है शर्माते

जबसे तुमने घूँघट  काढ़ा
होती अब ना मुलाकातें

दिन तो मुशकिल में कटती है
कटती न बैरन रातें

कैसे धीर धरु मैं बोलो
कुछ तो आकर समझाते

कर के बहाना आ भी जाओ
करनी है मीठी बातें

घिर आए मेघ पिया

घिर आए मेघ पिया  तुम न आए

होता क्यों महीना सावन का सुहाना
पाती में लिख भेजी तुमने बहाना
सौतन की याद में मुझे बिसराए

घिर आए मेघ पिया  तुम न आए

जाने क्यों आती है जालीम जवानी
होती क्यों गौरा सब साजन सयानी
निष्ठूर निर्दयी तेरी यादें सताए

घिर आए मेघ पिया  तुम न आए

मालुम जो होता की निष्ठुर हो राजा
बजवाते क्यों बाबा देहरी पे बाजा
अच्छा था रह जाती मैं बिना ब्याहे

घिर आए मेघ पिया  तुम न आए

यह प्यार का नशा है

लाख तुम छिपाओ
कुछ मत मुझे बताओ
यह प्यार का नशा है
सर चढ़के बोलता है

आखें तुम्हारी रक्तिम
क्यों हो रही अभी से 
तुम भींग क्यों रही हो
अनजान सी नमी से
तुम लाख सर हिलाओ
नज़रें भले चुराओ
यह प्यार का नशा है
सर चढ़के बोलता है

धड़कने तुम्हारे दिल की
क्यों तेज़ हो रही हैं
साँसों की तेरी उष्मा
सब भेद कह रही है
नाख़ून न चबाओ
तुम लाख भाग जाओ
यह प्यार का नशा है
सर चढ़के बोलता है

दर्पण के सामने जा
खुद उससे पूछ देखो
वह झूठ अगर कहे तो
तुम दोष मुझको देना
आँचल की ओट करके
मुँह न मुझे बिराओ
यह प्यार का नशा है
सर  चढ़के बोलता है

साठवें वर्षगाँठ पर अनाम सुन्दरी को देखकर

हज़ारों कौंध कर टूटी बिजलीयाँ
लगा सागर में है सैलाब आने
किसी के रूप का उद्दीप्त चेहरा
चला कैसा अरे जादू जगाने

वगैर मरकत के फिर भी रोशनी है
उजाला गोसे गोसे में समाया
स्वर्ग की किन्नरी उतरी धरा पर
ह्रदय में फिर नया तूफान आया

मैं संयम का लबादा ओढ़ कुंठीत
जलूं इस आग में ऐसा न होगा
अमिय का पान पहले छक के कर लूं
तभी मानव जन्म यह पूर्ण होगा

पास न आओगे क्या बोलो

मीठी मीठी बातों से ही दिल बहलाओगे
पास न आओगे क्या बोलो पास न आओगे

             जबसे तुमको देखा मन में घुस आया एक चोर
             डर लगता है कैसे कह दूं , तुमको मैं चितचोर
             मेरी गुत्थी मेरी उलझन क्या सुल्झाओगे

             पास न आओगे क्या बोलो पास न आओगे

खोल के रख दूं ह्रदय अगर तो दोष नहीं देना
मन को अधरों तक आने से रोक नहीं देना
मेरा मौन समर्पण कैसे तुम झुठलाओगे

पास न आओगे क्या बोलो पास न आओगे

             मंत्रविद्ध हूँ इसीलिए मैं खिंचा चला आया
             वचनवद्ध हूँ इसीलिए सच छूपा नहीं पाया
             मेरे जितना साहस क्या तुम भी दिखलाओगे

             पास न आओगे क्या बोलो पास न आओगे

सहज समर्पण कभी कहीं ब्यभिचार नहीं होता
दो दिल मिल जाने पर ही निर्माण नया होता
मेरे शोणित की ऊष्मा से खिल खिल जाओगे


पास न आओगे क्या बोलो पास न आओगे

भूल गए हम

भूल गए हम
जबसे तुमको देखा
खुदको भूल गए हम
सचमुच भूल गए हम


अल्हादित हो झूम उठा मन
मह मह महका जीवन उपवन 
ठौर मिल गया इस जीवन को
अब ना बनेंगे सन्यासी हम


भूल गए हम


खुले द्वार सब बंद अमिय के
पाने को मकरंद कलि के
रस प्लावित आओ अब हो ले
तोड़ लाज के बंधन सब हम


भूल गए हम
जबसे तुमको देखा
खुदको भूल गए हम
सचमुच भूल गए हम

रुबाई - 12

उम्र  कट  जाएगी  वीरानों में
किस्से रह जाएंगें  फसानों में
करेंगें  ज़िक्र  मेरा  लोग कभी
कैस, फरहाद  से  दीवानों   में

रुबाई - 11

प्यार  किताब  नहीं  है  जिसको
पढ़कर  अनुभव  करोगे  जानोगे
रखकर देखो किसीका दिल तभी
प्यार  क्या  होता  है यह जानोगे

रुबाई - 10

जो खोजता था  प्यार में वो सब कुछ मुझे मिला
मैं   काँच   था   पर   आपने   हीरा   बना   दिया
हैं    शब्द   नहीं    क्या    करूँ   तारीफ़   आपकी
ज़र्रे  को    आपने    तो    सितारा    बना    दिया

रुबाई - 9

सादगी    उसकी    निराली    देखी
मद   भरे   नयनों  की प्याली देखी
वैसे   उगते   हुए   सूरज  में  भी  न  पाया रंग
लाली जो देखी वो बस उसके ही गालों  पे देखी

रुबाई - 8

क्यों नहीं हो रहा है तुमको यकीन
मेरे  दिल  मेरी  मुहब्बत  तुम  हो
जैसे  देखा  था  ख्वाब  में  तुमको
हाँ  वही  हाँ  वही बिलकुल तुम हो

रुबाई - 7

तेरे   गालों   पे   ज़िन्दगी   देखी
तेरे   ओठों  पे  फूल   खिलते   हैं 
तेरी   इन   नीमबाज  आँखों   से
दिल को तस्कीन बहुत मिलते हैं

गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

रुबाई - 6

आज की रात  क्या  करे  कोई
तारों  से  बात  क्या करे  कोई
आप  तो  रूठ  कर यूँ   बैठे  हैं
आप  से  बात  क्या  करे कोई

रुबाई - 5

तुम  मेरे  धर्म  हो  ईमान  हो
शायरी  की  मेरी तुम जान हो
धड़कने सुन लो मेरे दिल की भी
हाँ हाँ  तुम ही मेरे भगवान हो


रुबाई - 4

खोया खोया सा देखता हूँ मैं
हरसू तुझको ही देखता हूँ मैं
नीम पागल कहो या आवारा
ख्वाब  तेरा  ही  देखता हूँ मैं

रुबाई - 3

नींद  आई  तो  ख्वाब देखा   है
तेरा   बागी    शबाब   देखा   है
चेहरा लगता है जाना पहचाना
जैसे   कोई    गुलाब   देखा   है

रुबाई - 2

आप को बेनकाब देख लिया
सुर्ख ताज़ा गुलाब देख लिया
चाँद के हुस्न का जवाब न था
चाँद का भी जवाब देख लिया

रुबाई - 1

जितनी खुशिया मिले वह क्या कम है
जब  मेरे   पास   तुम  हो  क्या  गम है
प्यार   जितना   मैं   दे   सकू   ले   लो 
आदमी    की    उम्र    बहुत   कम    है