शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

दोहा 2

दिल जो तुमको चाहता है हम है बेबस  क्या करे
हम तो अपना दिल तेरी तस्वीर से बहला रहें

मत परेशां हो बहारो के लिए तुम  जानेमन
हम  बहारो की लिए सौगात चल के आ रहे

खोल कर दिल रख दिया हमने तुम्हे अब क्या कहे
आप अपनी बारी में नाहक प्रिये शर्मा रहे

सांसें सिमटी जा रहीं है सोच कर देखो ज़रा
मत सजा अपने को दो कब से तुम्हे समझा रहे

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