कविता मेरी ज़िन्दगी है
गुरुवार, दिसंबर 29, 2011
रुबाई - 2
आप को बेनकाब देख लिया
सुर्ख ताज़ा गुलाब देख लिया
चाँद के हुस्न का जवाब न था
चाँद का भी जवाब देख लिया
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